आदिपुरुष - सनातन धर्म पर ओछा मजाक। मनोज मुंतशिर। ओम रावत। अंकित गुप्ता। My Point Of View।


आज १६ जून २०२३ देश में एक बार फिर आक्रोश का माहौल बना हुआ है। इस आक्रोश का कारण देश के सबसे बड़े धरोहर विभिन्ता में एकता है। भारत में अनेक प्रकार की भिन्नता है। ये ही भारतवर्ष की खूबसूरती भी है। लेकिन आज एक फिल्म ने कई तरह के भवनों को आहत किया है। खैर फिल्में और बॉलीवुड उन्होंने हमारे भावनाओं को आहत करने में कभी निराश नहीं किया है। एक तरफ कई फिल्में ऐसी बनती है जो इंसान के जीवन में उद्देश्य भर देती है या फिर मनोरंजन से भरपूर होती है। वहीं दूसरी तरफ कुछ निर्देशक और लेखक आधुनिकता, सरलता, और रचनात्मकता की आज़ादी के नाम पर इस क़दर का मजाक कर बैठते है जिसका कोई अर्थ ही नहीं बनता। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ ओम रावत, मनोज़ शुक्ला, और आदिपुरुष की। तो चलिये करते है मामले की तह से शुरुआत और करते है Analytical review - Dynamic view के साथ।


 

Analytical review with the findings

फिल्म के निर्माता ने इस फिल्म की जानकारी बहुत पहले ही दे दी थी। मेकर्स ने फिल्म की कहानी का आधार रखा सनातन धर्म के महान मर्यादा और संस्कृति को दर्शाती कथा रामायण को और सभी सनातनियों को ये विश्वाश कराया की रामायण को बड़े परदे पर एक भभ्य्ता के साथ उतारा जायेगा। कई वर्षों के काम और शूटिंग के बाद बहुत ही जोरो शोरो से फिल्म के टीज़र को टी - सीरीज़ के बैनर के तले प्रस्तुत किया गया। जिसको सभी सनातनियो का गहरा विरोध झेलना पड़ा। टीज़र में सभी चरित्र को लेदर के सेंडल्स पहने दिखाया गया था। वानर सेना को जंगली वानर की सेना दिखाया गया था। श्री राम, और लक्ष्मण को सफ़ेद धोती में दिखाया गया था। प्रभु हनुमान को एक मुस्लिम चरित्र की तरह प्रस्तुत किया गया था। माता सीता को गुलाबी साड़ी में स्लीवलेस ब्लाउज में दिखाया गया था। सोने की लंका को सोने का नहीं दिखाया गया और रावण सहीत रावण के सभी सेना को बहुत ही आधुनिक वस्त्र और हेयर स्टाइल में दिखाया गया था। 


मुझे पता है की यदि आप रामायण की थोड़ी बहुत भी जानकरी रखते है तो इतनी बाते आपके खून को खोला देने के लिए काफी है। फिल्म को १६ जून २०२३ को देश के सभी सिनेमा घरों में प्रसारित किया गया, जिसके बाद उसके बेहूदे संवादों जैसे की प्रभु हनुमान द्वारा बोला गया संवाद “कपड़ा तेरे बाप का, तेल तेरे बाप का, आग तेरे बाप की, तो जलेगी भी तेरे बाप की”, माता सीता द्वारा बोला गया “ये कैसी चीज दे रहे हो रावण तुम मुझे, कुछ ऐसा दो जो कुछ दिन तो चले” ने ना केवल सनातनी बल्कि हर धर्म के लोगो को निंदा करने पर मजबूर कर दिया। फिल्म के ग्राफ़िक्स और सीन्स कई अन्य फिल्मो से चोरी किये गए है। मैं पूरे फिल्म की गलतियां और उस पर तर्क नहीं दूंगा क्योंकि ओम रावत और मनोज शुक्ला के गलतियों पर मैं किताब नहीं लिखना चाहता। मैं केवल अपने द्वारा लिखे गए कुछ बातो पर ही प्रकाश डालूंगा।

रामायण की कथा सतयुग में वाल्मीकि द्वारा रचित है और ये विश्व के सबसे पुराने धर्म का एक हिस्सा है। आदिपुरुष में सभी चरित्र को लेदर के सेंडल्स पहने दिखाया गया था। किन्तु सतयुग में सभी खड़ाऊ पहना करते थे राजा से लेकर प्रजा तक और सेंडल की खोज कलुग में की गई है।

वानर सेना को जंगली वानर की सेना दिखाया गया था। संस्कृत के शब्द वानर का दो शाब्दिक अर्थ होते है - बंदर और वानर। आधुनिक युग ने सभी वानर सेना को बंदर की सेना समझते है किन्तु ये केवल ज्ञान का अभाव है। यदि आप महाकाव्य रामायण पढ़ते है तो आपको पता चलेगा की वानर सेना जंगल में रहती थी और इस प्रजाति और वर्ग की महिला एक सामान्य स्त्री की जैसी दिखती थी। सभी वानर संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे। सम्भव ये किसी बन्दर की व्याख्या तो नहीं हो सकती। यदि ऐसा है तो आज के आधुनिक समय में ऐसे वर्ग के वानर क्यों नहीं है ? केवल बंदर ही क्यों है ?

सत्य ये है की ये जंगलों में रहने वाले एक विशेष प्रजाति का वर्ग ग्रुप था। क्योंकि ये जंगल में अपना जीवन यापन करते थे तो ये बन्दर के भाँति कई सारी कलाओं में निपूर्ण थे जो की उनके जीवन यापन को सरल बनाता था। तो वानर सेना बंदर के सामान कलाओं में निपूर्ण एक योद्धा श्रेणी थी ना की बन्दर। रामायण का युद्ध केवल एक ऐसा युद्ध है जिसमें इस सेना ने भाग लिया था। यदि आप इस विषय पर और अधिक जानकारी चाहते है तो कमेंट करे मैं एक नयी आर्टिकल लिखूंगा। साथ ही और भी बहुत सारे तर्क दूंगा जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगी। आप उत्तर रामायण और वाल्मीकि रामायण से भी ये जानकारी ले सकते है।

फिल्म में श्री राम, और लक्ष्मण को सफ़ेद धोती में दिखाया गया था। किन्तु ग्रंथों में वस्त्रों का रंग भगवा बताया गया है। निर्देशक ने माता सीता को गुलाबी साड़ी में स्लीवलेस ब्लाउज में दिखाया गया था। किन्तु वाल्मीकि जी लिखते है की वनवास के दौरान माता सीता, प्रभु राम और लक्ष्मण ऋषि अत्रि के आश्रम गए थे। ऋषि अत्रि की भार्या माता सती अनुसुइया ने तीनों को बहुत ही आदर स्नेह और प्रेम दिया। माता सीता को अपनी पुत्री के समान माना और जाते वक्त एक दिव्य साडी भेंट दी जो ना कभी मैली होती थी और ना कभी भी फटती थी। वर्णन ये भी है की भेंट में दिए गए वस्त्रों का रंग भगवा था। और स्लीवलेस ब्लॉज का चलन तो बीसवीं सदी में आया है। मनोज ये भूल गए थे की संतान में खूबसूरती को ढका हुआ समझा जाता है ना भी बीसवीं सदी की तरह अर्धनग शरीर को खूबसूरत शरीर का दर्जा दिया जाता है।

ये तो फिल्म के निर्माता और निर्देशक के गलतियों का निमित्त मात्र है। खैर संवाद इतने ओछे है की आपको समझ नहीं आएगा की ये देवी देवता का चित्रण किया गया है या नीचता की हद पार की गई है।

खैर विवादों के बिच घिरी ये मूवी पूरी तरह से फ्लॉप हो गई है। सभी धर्म से लोगो ने इसका जमकर विरोध किया है। IMBD पर इसकी रेटिंग ४.४ की है जो और कम हो सकती है। नेपाल ने इस मूवी को बैन कर दिया है और राजस्थान में इसके प्रति PIL फाइल कर दिया गया है और भारत में भी बैन करने की मांग की गई है। उम्मीद है भारत सरकार भी जल्द ही इस मूवी को बैन कर देंगी।

निराशाजनक बात ये है की उत्तर प्रदेश के CM योगी आदित्यनाथ ने भी इस मूवी को उत्तर प्रदेश को बैन नहीं किया और ना ही कोई प्रतिक्रिया दी है। जबकि उनकी राजनीति में सनातन धर्म का प्रेम एक विशेष स्थान रखता है।

इसी बिच सूत्रों की खबर के अनुसार निर्देशक नितेश तिवारी ने फिर से रामायण पर एक फिल्म बनाने की घोषणा कर दिया है। और उन्होंने कहा है की वो रामायण के सभी मर्यादाओं का पालन करेंगे। देखते है ये क्या रंग लाएगी।


 

Dynamic view with the cons and pros

अपने सोशल मीडिया हैंडल पर सनातन का बखान करते रहने वाले मनोज ने ये ओछी हरकत क्यों किया ? ये सवाल सभी के जहन में उमड़ रहा है। अक्सर इंसान की कामयाबी और उसके काम की हो रही प्रशंसा उसके दिमाग में काबिल से अत्यंत काबिल होने भावना को जन्म देती है। वो खुद को नीचे की तरफ आता नहीं देखना चाहता। इंसान फिर कुछ ऐसा करना चाहता है जिसकी वजह से उसकी कार्य ऐतिहासिक हो जाये। इस भाव के करण एकता कपूर के सास बहू के संवादों को लिखने वाले मनोज ने रामायण के संवादों को बहुत ही नीचे स्तर पर गिरा दिया। मनोज ये भूल गए भी उनकी विशेषता सास बहू में है ना की ग्रंथों में।

शायद धर्म को आधुनिकता से मिलाने के चक्कर में वो ये भूल गए की रामायण धर्म ग्रन्थ है ना की केवल एक कथा।

मनोज को उनके किये की सजा मिल गई है। सरकार को भी ये मूवी बैन कर देनी चाहिए नही तो आने वाले पीढ़ियों को इसका दुष्प्रभाव झेलना पड़ेगा। उनके दिमाग में ये रामायण की एक गलत कथा भर देगी। जिस प्रकार इस फिल्म में मल युद्ध में वज्र के समान शरीर और पर्वत के समान ताकत रखने वाले प्रभु हनुमान को धराशाई होते दिखाया है वाकई निंदनीय है। वास्तविक रामायण में मल्लयुद्ध का कोई जिक्र नहीं पाया जाता है। किन्तु इस फिल्म में अनावश्यक मल युद्ध में राम की सेना को कमजोर दिखाया गया है।

क्या ये एक फिल्म काफी है जिसके ऊपर यह सब बवाल हुआ है? या फिर सिर्फ यही एक मूवी है जो सनातन विरोधी और धर्म का मजाक बनती है? क्या आपने कभी श्री राम को मांस खाने के लिए हिरण का शिकार करते देखा है ? या फिर चित्रण भी किया है ? यदि सुनकर खून खोल रहा है तो ठहर जाइये। हमारे बिच एक ऐसा लेखक मौजूद है जिसने अपनी कहानी में श्री राम को मांसाहारी बताया है। रावण को समुद्री लुटेरा, और ऐसे कई सारे झूठी बातें और कई सारे ग्रंथो के बारे में भी। और हैरानी की बात ये है की इस लेखक की रचना की तारीफ सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी किया है। यदि आप इसके बारे में और डिटेल में जानकारी चाहते है और इस झूठी किताबो पर बैन लगवाना चाहते है, तो जुड़े रहिये मेरे साथ बात करेंगे एक नए आर्टिकल में। 

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